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रविवार, 19 अप्रैल 2026

श्रीरामचरितमानस,सुंदरकांड

श्रीरामचरितमानस,सुंदरकांड
ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः ॐ श्रीजानकीवल्लभो नमः ॐ श्री हनुमते नमः  

समुद्र के किनारे जामबंदजी के वचन सुनकर हनुमानजी ने प्रभु श्री रामजी का नाम लेकर लंका जाने के लिए छलांग लगाए जिस पर्वत पर चढ़कर हनुमान जी ने छलांग लगाए वह पर्वत नीचे धस गया। आगे हनुमान जी को समुद्र में मैनाक पर्वत ने विश्राम करने को कहा लेकिन हनुमान जी ने उनको प्रणाम कर कहा रामजी का कार्य किए बिना हम विश्राम नहीं कर सकते। आगे जाने के बाद हनुमान जी को देवताओं के द्वारा हनुमान जी के बल और बुद्धि की परीक्षा लेने हेतु सुरसा राक्षसी भेजे, हनुमान जी ने सुरसा राक्षसी को अपने बुद्धि विवेक से परास्त कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर आगे बढ़े। हनुमान जी को आगे सिंहीका राक्षसी मिली जो छाया से हनुमान जी को पकड़ने लगी तब उसे मुष्टिका मारकर अंत किया।

हनुमान जी आगे जाकर लंका को देखा अति सुंदर और और अद्भुत था लंका में प्रवेश करते समय हनुमान जी को लंका की प्रहरी लंकिनी मिली हनुमान जी ने उसको भी मुष्टिका मार कर अचेत कर दिए। फिर आगे पूरी लंका को हनुमान जी ने देखा उन्हें एक ऐसा घर दिखा जो जो अति शोभायमान था धनुष और वाण का चित्र दीवार पे अंकित था एवं तुलसी का वृक्ष भी था। उसे देखकर हनुमान जी समझ गए कि यह कोई सज्जन मनुष्य का घर है उन्होंने उस घर के द्वार पर जाकर राम राम कहा तो अंदर से भी राम राम कह कर विभीषण जी जागे और हनुमान जी से भेंट वार्ता हुआ दोनों जने अति आनंदित हुए। तब विभीषण जी ने हनुमान जी को माता सीता का पता बताया कि वह अशोक वाटिका में राक्षसी के पहरेदारी में है। तब हनुमान जी अशोक वाटिका गए और माता सीता जी को अति व्याकुल देखा तब हनुमान जी ने छोटा रूप बनाकर एक वृक्ष पर चढ़कर माता सीताजी के आगे प्रभु श्रीराम जी का दिया हुआ मुद्रिका नीचे गिराए। माता सीताजी वह मुद्रिका देख थोड़ा विचलित हुई तब हनुमान जी ने करूणानिधान की शपथ देकर माता सीताजी के सामने प्रगट हुए तब कुछ वार्तालाप के बाद माता सीताजी का मन शांत हुआ। फिर हनुमान जी ने अपना विराट रूप दिखाकर माता सीताजी को भरोसा दिलाए कि अब आपको जल्दी ही प्रभु श्रीरामजी यहां से ले जाएंगे। तब हनुमान जी ने माता से आज्ञा लेकर अपना भूख मिटाने के लिए फल की वाटिका में गए और फल खाने के बाद कुछ वृक्ष को तोड़ने लगे तब राक्षसों ने उनको पकड़ने की कोशिश किया तो हनुमान जी कुछ को मारा और कुछ को अधमरा कर भेजा। तब रावण का पुत्र अक्षयकुमार आया तो उसे भी हनुमान जी मार दिए फिर मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर नगफांस में हनुमान जी को बांधकर रावण के दरबार में ले गए। 

हनुमान जी ने रावण को बहुत समझाने का प्रयास किया पर रावण अपने घमंड में चूर था वह हनुमान जी को पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया आग लगाने के बाद हनुमान जी ४९ पवन का वेग के साथ पूरी लंका में उछल उछल कर आग लगा दिए पूरी लंका धू धू कर जलने लगा त्राहि त्राहि मचने लगा। तब हनुमान जी समुद्र में जाकर अपनी पूंछ की आग बुझाए और माता सीताजी के पास लौटकर गए तब माता सीताजी ने अपनी चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को दिए और दृघजीवी का आशीर्वाद दिया। तब हनुमान जी ने माता सीता से आज्ञा लेकर वापस प्रभु श्री रामजी के पास आए हनुमान जी ने सभी समाचार प्रभु को बताए सभी अति आनंदित हुए। श्री रामजी ने हनुमान जी को ह्रदय से लगा लिए। तभी प्रभु श्री रामजी ने लंका की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिए उसी समय विभीषण जी ने रावण से प्रताड़ित होकर प्रभु श्री रामजी के पास आए तो श्री रामजी ने उन्हें स्वीकार किया और लंका का राजा बनाने का संकल्प लिया। सभी लंका की ओर प्रस्थान किए रास्ते में विशाल समुद्र था। प्रभु श्री रामजी ने तीन दिन तक समुद्र से रास्ता देने के लिए प्रतीक्षा की तब श्री रामजी ने समुद्र को सुखाने हेतु ब्रह्मास्त्र का संधान किए तब हाथ जोड़कर समुद्र देव प्रकट हुए और नल नील के द्वारा समुद्र पर सेतु का निर्माण करने का सुझाव दिए।
जय श्री सीताराम 
गोस्वामी तुलसीदास महाराज की जय।
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