ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः ॐ श्री जानकीवल्लभो नमः ॐ श्री हनुमते नमः
प्रभु श्री रामजी ने समुद्र से उस पार जाने हेतु रास्ता देने हुतु समुद्र से कहा। तबतक प्रभु रामजी के मन यह विचार आया कि भगवान भोलेनाथ की आराधना करने के बाद ही लंका की तरफ कूच किया जाय। उन्होंने बाबा भोलेनाथ की लिंग की स्थापना करके विधि विधान से अपने आराध्य बाबा भोले नाथ की पूजा अर्चना किए और आशीर्वाद लिए। वह स्थान श्रीरामेश्वरम के नाम से पूजित एवं विख्यात हुआ और समस्त भक्तों के कल्याण का एक धार्मिक स्थल बन गया। जिसका दर्शन करने से जीव का कल्याण एवं बाबा भोलेनाथ की कृपा होने लगा। तत्पश्चात नल और नील एवं समस्त वानरों के द्वारा एवं प्रभु श्रीराम की कृपा से महासमुद्र में सेतु का निर्माण हुआ और सभी सेना समुद्र के उस पार हुए। लंका के निकट सुबेल पर्वत पर प्रभु श्रीरामजी एवं समस्त बानर सेना ने अपना निवास स्थान बनाए। तत्पश्चात् प्रभु श्रीरामजी ने अंगद जी को अंतिम प्रयास करने हेतु लंका में रावण के पास भेजने का सुझाव दिए। अंगद जी लंका गए रामजी के दूत बनकर और रावण को बहुत समझने का प्रयास किया परंतु रावण ने अपनी हठ के कारण अंगद जी का कोई भी सुझाव नहीं माना,नासहिं काल विनाशाहि बुद्धि, अंगद जी अपना बल दिखाकर वापस रामजी के पाास आ गए और पूरा वृतांत प्रभु श्रीराम जी को सुनाए।
तब प्रभु श्रीरामजी ने समस्त बानर सेना को लंका पर आक्रमण करने का आदेश दिए लंका के प्रमुख चार दरवाजे थे इन सभी दर्रबाजो पर श्री रामजी की सेना ने आक्रमण किया महा युद्ध आरम्भ हो गया। रावण का पुत्र मेघनाद ने अमोघशक्ति वाण से लक्ष्मण भैया को मूर्छित किया तब हनुमान जी ने लंका से सुषेण वैद्य को लाकर एवं पूरा द्रोणागिरी पर्वत को उठा लाए जिस पर संजीवनी बूटी थी। वैद्य ने इस बूटी का रस लक्ष्मणजी को पिलाए और वह उठ खड़े हुए। फिर भीषण संग्राम आरंभ हो गया तब लक्ष्मण जी ने मेघनाद को मार दिए। तत्पश्चात रावण का भाई कुंभकरण आया जो अति बलवान था उन्होंने रावण को नेती की बात कहा पर रावण किसी का नहीं सुना तब कुंभकरण ने प्रभु श्रीरामजी से युद्ध किया वीरगति को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात रावण ने युद्ध के लिए मैदान में उतरा प्रभु श्रीरामजी एवं रावण में भीषण संग्राम हुआ एकतरफ स्वयं भगवान और दूसरी तरफ अति महाबलशाली रावण अंततः रावण को नाभिकुंड में श्री रामजी ने वाण मारा जहां रावण का अमृत एवं प्राण वसा था वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। सभी देवताओं ने श्री रामजी के ऊपर फूल बरसाए चारों दिशा आनंदित हो गया। रामजी ने विभीष जी को लंका का राजा बना दिए।
तत्पश्चात माता सीता के साथ प्रभु श्रीरामजी एवं महाराज विभीषण जी एवं हनुमान जी और सुग्रीव जी को साथ लेकर पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान किए। जहां जहां जो जो घटनाएं घटी थी वह प्रभु श्रीराम जी ने माता सीता जी को बताते जा रहे है। अयोध्या लौटते समय मार्ग में समस्त ऋषि मुनि जनों को प्रभु श्रीरामजी ने अपना दर्शन लाभ देकर धन्य किए। फिर प्रयाग में आकर गंगा स्नान किए माता सीताजी ने मां गंगा की पूजा की आशीष लिए। तब प्रभु श्रीरामजी ने हनुमान जी को अयोध्या जाने को कहा अपने आगमन का संदेश देने हेतु। हनुमानजी अयोध्या को प्रस्थान किए।
जय श्री सीताराम
गोस्वामी श्री तुलसीदास महाराज की जय।
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