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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

श्रीरामचरितमानस,किष्किन्धाकाण्ड

श्रीरामचरितमानस,किष्किन्धाकाण्ड
ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः ॐ श्री जानकीवल्लभो नमः ॐ श्री हनुमते नमः 
प्रभु श्रीरामजी और भैया लक्ष्मणजी माता साबरी जी की आश्रम से माता सीताजी की खोज में पम्पा सरोवर गए वहां विश्राम के बाद ऋषिमुख पर्वत की तरफ आगे बढ़े जहां सुग्रीव जी और हनुमान जी रहते थे। प्रभु श्रीरामजी और भैया लक्ष्मणजी को देखकर सुग्रीव जी को भय हुआ कि मेरा भाई बाली ने मुझे मारने के लिए मनुष्य भेष में दोनों राजकुमार को भेजा है तब सुग्रीव जी ने हनुमानजी को यह पता लगाने को भेजा कि ये दोनों राजकुमार कौन है और इस पर्वत की तरफ क्यों आ रहे है। तब हनुमानजी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर प्रभु श्रीरामजी के पास आए और विनम्र भाव से उनसे परिचय लिए श्रीरामजी ने अपना परिचय के साथ आने का पूरा वृतांत सुनाए तब हनुमानजी अति भावुक मुद्रा में अपना मूल स्वरूप में आए और अपना परिचय प्रभु श्रीरामजी को दिए। श्रीरामजी ने हनुमान जी को ह्रदय से लगाए और सुग्रीव जी से मिलने की आग्रह किए। श्री हनुमानजी ने श्रीरामजी और भैया लक्ष्मणजी को अपने कंधे पर बिठाकर सुग्रीवजी के पास ले गए और दोनों में मित्रता हुई। तब सुग्रीवजी ने अपना व्यथा प्रभु श्री रामजी को बताए तब प्रभु श्रीरामजी ने सुग्रीवजी को अस्वस्थ किया कि मै बाली को मारकर आपको किष्किंधा का राजा बनाऊंगा। तब प्रभु श्रीरामजी ने बाली को मारकर सुग्रीवजी को किष्किंधा का राजा बना दिए। उसके बाद सुग्रीवजी राजा बनकर भोग विलास में लिप्त हो गए।

 जब शरदऋतु आरंभ हो गया तब श्री रामजी ने लक्ष्मणजी को सुग्रीवजी के पास भेजा तब वह श्री रामजी से माफी मांगकर अपने सभी बानर सेना को चारों दिशा की ओर भेजे। उसमें दक्षिण दिशा की ओर हनुमान जी अंगद जी और जमाबंद जी गए। आगे सघन जंगल में जाने के बाद सभी बानर सेना को भूख प्यास लगी तब उन्हें विंध्याचल के घने जंगलों में एक बहुत बड़ी गुफा मिली, जो मायासुर की मायावी गुफा थी जिसका नाम ऋक्षबिल था। उस गुफा के अंदर उन्हें स्वयंप्रभा  नाम की एक तपस्विनी मिलीं। जो रामजी जी प्रिय भक्त थी, गुफा अति सुंदर मनमोहक और निर्मल जल सुंदर फूल और फल से सुशोभित था। श्री हनुमानजी ने उस तपस्विनी से संवाद किए और आने का कारण बताए तब वह स्वयंप्रभा ने सभी बानर सेना को आज्ञा दी कि आप सब अपना भूख प्यास को तृप्त करले उसके बाद आप अपनी आंखें बंद करले मै आप सभी को इस वन से बाहर निकाल दूंगी। वैसा ही हुआ वह तपस्विनी ने सभी बानर सेना को महा सागर के निकट पहुंचा दिए और शुभकामनाएं दी कि आपका कार्य सिद्ध हो। वहीं पर सब बानर आपस में वार्तालाप कर रहे थे कि अब माता सीताजी को कैसे ढूंढा जाए । वहीं पर लवन सागर के पास संपातीजी का निवास था उन्होंने इन सभी बानर सेना की बात सुनी जिसमें जटायु की चर्चा थी संपातीजी ने पूरी बाते जानने के बाद बानर सेना को कहा कि माता सीताजी को रावण ने अपने लंका मै अशोक वाटिका में रखे हुए है। जो भी इस विशाल समुद्र को पार करके लंका जाएगा वह माता सीताजी को पता लगा लेगा।
सभी बानर सेना के लिए इस विशाल समुद्र को पार कर पाना बहुत कठिन कार्य था। तब जमाबंद जी ने हनुमान जी को अपने मूल शक्ति को याद दिलाए। 
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥2॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥3॥
तब हनुमानजी ने अपना विराट रूप किए और उस विशाल एवं विराट सागर को पार करने के लिए तैयार हो गए।
जय श्रीसीताराम
गोस्वामी श्री तुलसीदासजी महाराज की जय।
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