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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

श्रीरामचरितमानस,आरण्यकांड

श्रीरामचरितमानस, आरण्यकांड 
ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः ॐ श्री जानकीवल्लभो नमः ॐ श्री हनुमते नमः 

भगवान श्रीरामजी एवं माता सीता और भैया लक्ष्मणजी के साथ चित्रकूट में निवास करते है। एक समय की बात है भगवान श्रीराम जी माता सीताजी के लिए फूलों का श्रृंगार सामग्री बनाए और माता सीताजी को पहनाए उस समय सभी देवताएं भगवान की यह लीला देख रहे थे। उसी में इंद्र देवता का पुत्र जयंत भी ये सब देख रहे थे उनके मन में  आया कि भगवान थोड़े ही पत्नी को श्रृंगार से सजाते ये भगवान नहीं है। ऐसा भाव लेकर जयंत श्रीरामजी का परिक्षा लेने के लिए कौआ का रूप धारण कर माता सीताजी के पांव में चोंच मारकर भाग गया। जब श्रीरामजी को ये पता लगा तो उन्होंने कुश का ब्रह्मास्त्र जयंत के पीछे छोड़ दी। जयंत तीनों लोक और १४ भुवन में भटकता रहा पर कोई सहायता नहीं की तब नारद जी ने जयंत से कहा कि संसार जब मनुष्य को मरता है तो श्रीरामजी बचाते है। जिसे श्रीरामजी ने मारा हो उसे कौन बचाएगा? तब जयंत भगवान श्रीरामजी से माफी मांगने गए तब माता सीताजी ने प्रभु रामजी से जयंत को माफ करने के लिए आग्रह किया तब श्रीरामजी ने उसे माफ कर दिए भगवान तो करूणानिधान है।

प्रभु श्रीरामजी माता सीताजी के साथ अत्रि मुनि के आश्रम में गए अत्रि मुनि जी ने प्रभु का आत्मीयभाव से स्वागत किया और अपने आप को धन्य मासूस किए।फिर अत्रि मुनि जी की पत्नी अनसूया जी ने माता सीताजी को नारी की धर्म और कर्म की ज्ञान दिए और अपनी भक्ति प्रदान की।
उसके बाद श्रीरामजी को शरभंग ऋषि से भेंट हुआ और ऋषि प्रभु के धाम को गए। आगे रस्ते में श्रीरामजी को हड्डियों का ढ़ेर दिखा तब ऋषि मुनियों ने उन्हें कहा यह सब ऋषि मुनियों का हड्डी है जिसे राक्षसों ने अपना आहार बनाया है। तब श्रीरामजी ने शपथ लिया कि इस धरा को राक्षसों से मुक्त करना मेरा पहला कार्य होगा।
फिर श्रीरामजी आगे बढ़े दंडकवन में अगस्त्य ऋषि से भेंट हुआ अपने अपने को धन्य मासूस किए।
फिर आगे चलकर गोदावरी नदी के तट पर सुंदर पंचवटी स्थान पर प्रभु श्रीरामजी एवं माता सीताजी और भैया लक्ष्मणजी के साथ निवास करने लगे। उसी समय रावण की बहन शूर्पणखा आती है और श्रीरामजी से विवाह का प्रस्ताव रखती है तब प्रभु श्रीरामजी ने लक्ष्मण भैया को इशारा करते है तब लक्ष्मण भैया ने शूर्पणखा को नाक और कान काट कर बिदा किया। उसके बाद खर और दूषण को भगवान ने संहार किया।
यह खबर जब रावण को मिला तब वह सोचने लगा कि भगवान के अलावा खर दूषण को और कोई नहीं मार सकता था इसका मतलब भगवान का अवतरण हो गया है। तभी रावण ने सोचा कि अब मेरा भी उद्धार भगवान के हाथों ही होगा। तभी उन्होंने सीताजी का हरण करने का मन बनाया और मारीच को साथ लेकर पंचवटी की ओर गया मारीच ने माया का रूप धरकर स्वर्ण मृग बना।

माता सीताजी ने इस मृग को देखकर मोहित हो गई और प्रभु श्रीरामजी से कहा स्वामी आप इसे पकड़ कर ला दीजिए तब श्रीरामजी ने उस माया मृग को मारा उसके बाद रावण ने माता सीताजी को छल करके हरण किया।
पक्षीराज जटायु ने रावण से माता सीताजी को छुड़ाने का काफी कोशिश किया पर जटायु का पंख रावण ने काट दिया और वह नीचे गिर पड़े। प्रभु श्रीरामजी को जटायु जी ने पूरा वृतांत सुनाया और वह भगवान के धाम को गए। श्रीरामजी ने जटायु का अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया। प्रभु आगे चले रास्ते में कबंध राक्षस को उद्धार किए और ब्राह्मण की महिमा बताए कि ब्राह्मण सदैव पूजनीय है।
आगे चलने के बाद माता सबरी आश्रम में प्रभु श्रीरामजी का आगवन हुआ मातंग ऋषि ने सबरी माता को यह कहा था कि श्रीरामजी आयेंगे माता सबरी ने तभी से रामजी का वाट जोह रखी थी। उसी वचन को निभाने के लिए श्रीरामजी ने माता सबरी आश्रम गए। माता सबरी धन्य हो गई। भगवान श्रीरामजी ने माता सबरी को नवधा भक्ति प्रदान की,
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथी भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरष न दीना॥
यह भक्ति प्राप्त करने के बाद माता सबरी ने अपने गुरु के पास भगवान के धाम को चली गई।
नवम भक्ति में से एक भी किसी मनुष्यों ने आत्मसात किया तो उसका कल्याण निश्चित है। 
माता सबरी के मार्गदर्शन से माता सीता की खोज में भगवान पम्पा सरोवर पहुंचे और वहीं पर विश्राम किया।
जय श्री सीताराम।
गोस्वामी श्री तुलसीदास महाराज की जय।
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