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सोमवार, 30 मार्च 2026

श्रीरामचरितमानस,अयोध्याकांड

श्रीरामचरितमानस,अयोध्याकांड 
ॐ श्रीगणेशाय नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः  ॐ श्री जानकीवल्लभों  नमः ॐ श्रीहनुमते नमः

अवधपुरी में प्रभु श्रीराम और मां जानकी का विवाह उत्सव कई दिनों तक हर्ष और उल्लास के साथ मनाया गया पूरा अयोध्या में समस्त रिद्धि सिद्धि का निवास हो गया चारों तरफ हर्ष और उल्लास एवं खुशियां ही खुशियां उमड़ने लगा सभी अयोध्यावासी आनंदपूर्वक अपना जीवन जीने लगे। कुछ समय बीतने के बाद राजा दशरथ जी को यह एहसास हुआ कि अब हमे ज्येष्ठ पुत्र राम को राज्यसिंहासन पर शोभित किया जाना चाहिए, अब वह योग्य हो गया है। गुरु वशिष्ठ जी एवं समस्त प्रजाजन से सहमति लेकर राजा दशरथ जी ने राम जी का राज्याभिषेक की घोषणा कर दी। सभी अयोध्यावासी अति आनंदित हुए।
उसी समय माता कैकेई के दासी मंथरा को यह समाचार मिला तो उसने कुटिल चाल चली और माता कैकई को भ्रमित किया पुत्र मोह के जाल में कैकई ने राजा दशरथ जी से दो वरदान मांगे १.भरत का राजतिलक और २.श्री राम जी को १४ वर्ष का वनवास यह अति कठोर वचन सुनकर राजा दशरथ जी मूर्छित हो गए। तब प्रभु श्रीराम जी ने पिता को सांत्वना दिया और पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया और माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वन को चल दिए। ये सभी लीलाएं भगवान की ही पूर्व रचना थी। कुछ प्रजा भी उनके साथ चलने लगा पहले दिन तमसा नदी के तट पर रात्रि विश्राम हुआ सभी अयोध्यावासी मायापती के माया में सो गए और प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ आगे श्रृंगवेरपुर गंगा के तट निषादराज के क्षेत्र में पहुंचे और निषादराज से मित्रता हुई। फिर केवट का करुणा भरी प्रेम का वार्तालाप प्रभु श्रीराम के साथ हुआ। केवट का अनेक जन्मों का बंधन टूट गया साक्षात नारायण से मिलन हुआ।ऐसा मिलन बड़े बड़े तपस्वी को भी असंभव है जैसा मिलन केवट और प्रभु श्रीराम का हुआ।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं
केवट ने प्रभु राम जी को गंगा पर किया उसके बाद महर्षि बाल्मीकि जी को यह समाचार मिला कि श्रीराम और माता सीता गंगा पार करके आश्रम की तरफ आ रहे है तब उन्होंने खुद आकर प्रभु राम जी और माता सीता जी को अपने आश्रम ले गए अद्भुत मिलन हुआ प्रभु राम और महर्षि बाल्मीकि जी का, दोनों आपने आपको धन्य अनुभव किए। फिर प्रभु राम जी ने बाल्मीकि जी से आगे जाने का मार्ग की मार्गदर्शन लिए, तब महर्षि बाल्मीकि जी बड़ा ही अनमोल वचन कहे हे राम आप हर जगह पर है आप जहां पर रहेंगे वही जगह सर्वोत्तम होगा। फिर बाल्मीकि जी भगवान को १४ जगह रहने का उपदेश दिए है जहां पर भगवान का निवास होगा। फिर आगे का मार्ग चित्रकूट को सबसे उत्तम जगह बतलाए। वहीं पर मंदाकिनी नदी बहती है और अत्रिमुनि जी का भी आश्रम है।  प्रभु श्रीराम जी ने माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ  वहीं पर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे।

इधर अयोध्या में राजा दशरथ जी का राम जी के वियोग में निधन हो गया। भरत और शत्रुघ्न जी को ननिहाल से बुलाया गया और राजा दशरथ जी का विधि विधान से अंतिम संस्कार किया गया। तत्पश्चात भरत जी और  गुरु वशिष्ठ जी एवं समस्त अयोध्यावासी श्रीराम जी को अयोध्या वापस लाने के लिए वन को चले साथ में तीनों माताएं भी चली, उधर जब राजा जनक जी को ये समाचार मिला तो वे भी माता सुनैना के साथ चित्रकूट पहुंचे। भरत जी का भाव ऐसा है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है प्रभु श्रीराम का परम प्रिय है भरत जी, और भरत जी के सर्वस्व है श्रीरामजी। चित्रकूट में सभी बंधु बांधव से भेंट वार्ता हुआ एक दूसरे ने अपनी अपनी व्यथा सुनाई बहुत सारी वार्तालाप हुआ श्रीराम जी को वापस अयोध्या लाने हेतु परंतु ये तो भगवान का ही लीला है वे जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा। फिर अंत में प्रभु श्रीराम जी ने अपना खड़ाऊ पादुका भारत जी को दिए भारत जी को ऐसा लगा कि श्रीराम जी ने मुझे सर्वस्व दे दिए ऐसा भाव प्रकट हुआ कि उस पादुका को अपने मस्तक पर रखकर साक्षात श्रीराम जी का आशीर्वाद मानकर और प्रभु श्रीराम से आज्ञा लेकर सभी बंधु बांधव के साथ अयोध्या को लौट चले। 
शुभ मुहूर्त में श्रीराम जी के उस पादुका को राज्य सिंहासन पर बिराजमान कर प्रणाम किए और ऐसा भाव मन में बसा लिए कि वह पादुका नहीं साक्षात श्रीराम जी राज्य के सिंहासन पर बिराजमान है। सभी मंत्रियों को अपना अपना कार्य सौंपकर गुरु वशिष्ठ जी से आज्ञा लेकर नंदीग्राम में एक पर्णकुटी बनाकर धरती के नीचे वनवास की भांति अपना जीवन बिताने लगे। धन्य है भरत जी उनका भक्तृप्रेम, युगों युगों तक अमर रहेगा श्रीराम जी और भैया भरत जी का यह प्रेम।
जय श्री सीताराम,
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