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शनिवार, 7 मार्च 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १८

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १८
मोक्ष संन्यास योग
जय श्री कृष्णा 
भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता के १८ वे अध्याय में अपने प्रिय सखा अर्जुन को गीता के सम्पूर्ण अध्याय का सारांश बताते हुए कहते है कि जीवात्मा भगवान को कैसे पहचाने और क्या करने से भगवान प्रसन्न होते है। इसी सम्पूर्ण ज्ञान,कर्म और भक्ति को भगवान को समर्पित कर जीवात्मा अपना जीवन को सार्थक बना सकता है। यही मूल सिद्धांत इस भगवद्गीता का संपूर्ण ज्ञान है।
भगवान के इस श्रृष्टि में प्रकृति के तीन गुण है। इसी गुणों के बीच जीवात्मा का जीवन चलता है। ये तीन गुण है।
१.सतोगुण २.रजोगुण ३.तमोगुण, यही तीनों गुण के आधार पर जीवात्मा मुक्ति और मोक्ष प्राप्त कराता है और यही गुण जीवात्मा को दुर्गति और अधोगति भी प्राप्त कराता है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जीव को भगवान के बताए मार्ग पर चलना चाहिए धर्म शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को निष्कामभाव से कर्म करते हुए जीवन के मुख्य उद्देश्य को प्राप्त करना चाहिए। 

प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से ही जीव का मन,बुद्धि,विवेक और कर्म संचालित होते हैजैसा गुण का प्रभाव होगा वैसा चित और कर्म होगा और वैसा ही उसका परिणाम निकलेगा। जीवात्मा को चाहिए कि वह सतोगुण का विकाश अपने जीवन में करे और भगवान के नजदीक आये जिससे उसका समस्त कल्याण हो सकेगा और जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर सकेगा। गीता का संपूर्ण ज्ञान इसी बात का अनुमोदन करता है और जीवात्मा के लिए कल्याण का मार्ग है।

इस संसार में सभी एक जैसा नहीं हो सकता है क्योंकि प्रकृति के ये तीनों गुणों का प्रभाव अलग अलग होता है।
प्रथम और उत्तम गुण है सतोगुण, इस गुण को आत्मसात करने वाला जीव भगवान के परम प्रिय होते है। उसके  बाद आता है रजोगुण, ये गुण वाला जीव संसार को ही सर्वोपरि मानता है इसीलिए मझधार में फंसा रहता है। मोह,लोभ और आशक्ति में फंसकर उसी में उलझा रहता है 
तीसरा है तमोगुण, ये गुण निम्नकोटी के है ऐसे गुण वाला जीव आसुरी स्वभाव वाला होता है इसे भगवान या धर्मज्ञान से कोई मतलब नहीं होता है यह अपने मन का करता है और अधोगति यानी दुर्गति को प्राप्त करता है।
भगवान का ये अनमोल और अद्भुत सृष्टि प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से ही संचालित होता है। ज्ञानी मनुष्य के लिए जो इसमें उत्तम होता है उसी गुण को अपने जीवन में विकसित करता है। जैसा गुण का प्रभाव होगा वैसा मन,बुद्धि और कर्म होगा और उसी के अनुसार फल प्राप्त होगा। मनुष्य जीवन भगवान का सबसे प्रिय जीव है इसीलिए भगवान के प्रति प्रेम विश्वास और भक्ति आवश्य होना चाहिए और यग,जप,तप,ध्यान और निष्कामभाव से कर्म ही मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। तभी भगवान का ये अनमोल एवं प्रिय मनुष्य जीवन अपनी सार्थकता को प्राप्त कर सकता है।

तन सुखाय पिंजर कियो रहे रैन दिन ध्यान।
तुलसी मिटे ना वासना बिना बिचारे ज्ञान।
जय श्रीकृष्ण।
https://www.jivankisachai.com/

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