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शुक्रवार, 6 मार्च 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १७

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १७
श्रद्धा के विभाग योग
जय श्रीकृष्ण 
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के १७ में अध्याय में श्रद्धा के विभाग का वर्णन करते हुए सखा अर्जुन को कहते है कि हे अर्जुन इस जगत में मनुष्य प्रकृति के गुणों के अनुसार अपना व्यवहार करता है। इस प्रकृति में ३ प्रकार के श्रद्धा है और उसी श्रद्धा भाव से मनुष्य इस संसार में अपना कार्य करता है। जिस मनुष्य का जैसा श्रद्धा होता है वह वैसा ही कार्य करता है और उसी के अनुसार उसको फल प्राप्त होता है।
श्रद्धा के तीन विभाग है।

१. सात्विकी श्रद्धा- जो जीवात्मा सात्विकी श्रद्धाभाव से अपना कोई भी कार्य करता है वह उचकोटी का कार्य होता वह भगवान को प्रिय होता है। उसका फल भी उत्तम शुद्ध और पवित्र होता है। सात्विकी श्रद्धावाले जीवात्मा धर्मानुकूल यज्ञ, पूजा या अन्य कर्म करता है। उसका भोजन भी सात्विकी होता है जिससे उसकी मन बुद्धि और प्रवृति भी सरल स्वभाव और शांत होता है। वह भगवान को अपना सर्वस्व मानता है और उनके ही ज्ञान के अनुसार अपना जीवन जीता है और भगवान का प्रिय होता है। ऐसे मनुष्य में दया धर्म और करुणा होती है।जिससे कि अपना भी कल्याण होता है और दूसरों का भी कल्याण की भावना रहती है।

२. राजसिक श्रद्धा- जो मनुष्य अपने भोग विलास या सम्मान पाने की भावना से कोई भी कर्म करता है जैसे यज्ञ, पूजा दान या अन्य कर्म वह राजसिक श्रद्धा कहलाता है। जिसमें मनुष्य अपने हित के लिए जो कार्य करता है केबल अपना ही फायदा हो औरों से कोई मतलब नहीं वह राजसिक श्रद्धा है इनका भोजन भी चटपटा तीखा और करबा होता है।ऐसे लोगों द्वारा किया गया कार्य मतलबी होता है अपना लाभ जिसमें हो ये वैसा ही व्यवहार करते है।

३. तामसिक श्रद्धा- इस प्रवृति वाले मनुष्य क्रोधी लोभी तामसी और आसुरी स्वभाव वाले होते है। इनका प्रत्येक कर्म धर्म विरुद्ध और नीच कोटि का होता है। ऐसे प्रवृति वाले मनुष्य जो भी पूजा या यज्ञ तप करते है वह भूत पिसाच को प्रसन्न करने के लिये और दूसरों को कष्ट या हानि पहुंचाने के लिए करते है। ऐसे प्रवृति वाले लोगों में दया धर्म विवेक नहीं होता है ये क्रूर स्वभाव वाले होते है। तामसिक प्रवृति वाले लोगों का भोजन भी तामसिक होता है जैसे मांस मदिरा वासी और अशुद्ध भोजन का सेवन । दूसरों को कष्ट या हानि पहुंचाने में ऐसे लोगों आनंद आता है। इनका आचरण क्षुद्र और अव्यावहारिक होता है। जो इन्हें नीच योनि में पुनः जन्म लेना पड़ता है और जन्म मरण के चक्कर में फंसे रह जाते है और अनेकों कष्टों का भोग भोगते है। 

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में मानव कल्याण के लिए जितने ज्ञान भक्ति कर्म और आचरण बताए है वह जीवात्मा को परम धाम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाले है। प्रत्येक जीवात्मा को श्रीमद् भगवद्गीता का अध्ययन और अध्यापन करना चाहिए जिससे उस जीवात्मा का कल्याण हो। और मोक्ष की प्राप्ति हो सके।

जनम तेरा बातें बीत गयो, रे तूने कबहु ना कृष्ण कहयो
जय श्रीकृष्ण
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