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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड

श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड
ॐ श्री गणेशाय नमः ॐ श्री सारस्वत्तै नमः ॐ श्री गौरीशंकराय नमः ॐ श्री जानकीवल्लभो नमः

भारतवर्ष में अवधपुरी अयोध्या सूर्यवंशी राजा दशरथ जी थे। वे सत्यनिष्ठ धर्मपरायण प्राक्रमी राजा थे उनके तीन रानियां थी, माता कौशल्या माता कैकई और माता सुमित्रा। राजा दशरथ जी को ६० वर्ष तक कोई संतान की प्राप्ति नहीं हुआ तब उन्हें एक दिन अहसास हुआ कि हमें संतान की प्राप्ति कैसे होगा उन्होंने कुलगुरु वशिष्ठजी से परामर्श किया उन्होंने पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया और यह शृंगी ऋषि के द्वारा सम्पन्न किया जाना था। तब राजा दशरथ जी इस यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने पायस (खीर) का पात्र राजा दशरथ जी को दिया वह खीर गुरु वशिष्ठ जी के परामर्श से तीनों रानियों को प्रसाद के भांति वितरित किया गया और तीनों रानियों ने वह खीर ग्रहण किया। कुछ समय उपरांत पवित्र चैत्र मास शुक्लपक्ष नवमी तिथि सभी ग्रह गोचर अनुकूलता के समय माता कौशल्या ने भगवान को प्राकट्य किया फिर माता कैकेई ने अपने पुत्र को प्राकट्य किया उसके बाद माता सुमित्रा ने अपने २ पुत्रों को प्राकट्य किया। भगवान के प्राकट्य के समय समस्त धरती सभी जीव जंतु सभी चर अचर भगवान के सभी अनुचर अवधपुरी अयोध्या में आकर भगवान का गुणगान करने लगे। सभी देवी देवताओं ने अपना अपना सर्वस्व अवधपुरी अयोध्या पर न्योछावर करने लगे समस्त अयोध्या हर्ष उल्लास उमंग और आनंद से खिल उठा। सूर्यदेव १मास तक अयोध्या के ऊपर बिराजमान रहे और भगवान के जन्मोत्सव का आनंद लेते हुए अपने आप को कृतार्थ अनुभव किए।

राजा दशरथ जी को चार पुत्र हुए। गुरु वशिष्ट जी ने चारों पुत्रों का नामकरण किया। माता कौशल्या के पुत्र का नाम राम हुआ। माता कैकई के पुत्र का नाम भरत हुआ और माता सुमित्रा के दोनों पुत्रों का नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुआ। अल्प समय में ही चारों भाई गुरु वशिष्ठ जी से समस्त विद्याएं प्राप्त की। जब चारों भाई कुछ बड़े हुए तो एक समय परम तपस्वी महाज्ञानी महर्षि विश्वामित्र जी राजा दशरथ के महल में पधारे। राजा दशरथ जी ने विश्वामित्र जी का आत्म समर्पण भाव से स्वागत किया और चारों भाइयों को उनसे आशीर्वाद दिलाए और आने का कारण पूछा तब महर्षि विश्वामित्र जी ने अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की आग्रह किए परन्तु राजा दशरथ को ये सहज स्वीकार नहीं हुआ  तब गुरु वशिष्ठ जी ने उन्हें तर्क के साथ समझाया कि इसमें राम और लक्ष्मण का ही हित है आप इन्हें जाने की आज्ञा दीजिए तब श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम की ओर चले रास्ते में श्रीराम जी ने ताड़का असुर का वध किया उसके बाद महर्षि विश्वामित्र जी के यग की रक्षा करते हुए मारीच को १०० योजन अपने बाण से दूर भेजा और सुभाऊ को मारा और यग पूर्ण कराए। महर्षि विश्वामित्र जी श्रीराम जी को अनेकों अस्त्र और शस्त्र प्रदान किए।

उसी समय मिथिला नरेश श्री जनक जी ने अपने पुत्री सीता जी का विवाह हेतु शिव जी का पिनाक धनुष यज्ञ का आयोजन किया जो भी पुरुष इस पिनाक धनुष को भंजन करेगा उसी के साथ सीताजी का विवाह होगा। इस यज्ञ में भाग लेने के लिए महर्षि विश्वामित्र जी को निमंत्रण मिला उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर मिथिला की ओर प्रस्थान किए रास्ते में माता अहिल्या जो कि गौतम ऋषि की पत्नी थी श्राप के कारण पत्थर की एक शिला बनी थी प्रभु श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र जी की आज्ञा से चरण स्पर्श किया और माता अहिल्या का उद्धार हुआ फिर वह अपने पतिलोक को गई। उसके बाद महर्षि विश्वामित्र जी और श्रीराम लक्ष्मण जी मिथिला पहुंचे वहां पर राजा जनक जी ने अपने परिकर के साथ महर्षि विश्वामित्र जी का आत्मीय स्वागत सत्कार किए उसके बाद श्रीराम जी से मिले। धनुष यज्ञ की तैयारी होने लगा इधर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण राजा जनक जी के पुष्प वाटिका में पुष्प लाने के लिए गए उसी समय जनक नंदिनी सीताजी भी मां गौरी पूजन हेतु उसी वाटिका में गई उसी समय प्रभु श्रीराम जी और माता सीता जी की प्रथम और मधुर दृष्टि मिलन हुआ। माता सीता जी को नारद जी के वचनों का आभास हुआ और उन्होंने प्रभु श्रीराम जी को अपना स्वामी भाव में महसूस किया और मां गौरी से प्रार्थना की मेरे मन के भाव को पूर्ण करें मां गौरी से आशीर्वाद लेकर माता सीता जी अपने महल को चली गई।
धनुष यज्ञ में अनेकों राजा आए थे जो अति बलशाली और पराक्रमी थे लेकिन कोई भी उस शिव जी के पिनाक धनुष को हिला भी नहीं सका राजा जनक जी बहुत ही चिंतित हुए कि इस धरती पर कोई भी वीर नहीं है तब महर्षि विश्वामित्र जी ने प्रभु श्रीराम जी को आज्ञा दी और कहा कि इस पिनाक धनुष का भंजन कर राजा जनक जी के मन को शांत करें। तब प्रभु श्रीराम जी ने उस पिनाक धनुष का भंजन कर दो टुकड़े कर दिए सभी देवगन फूलों की वर्षा की माता सीता जी भी उस पिनाक धनुष को हल्का होने के लिए श्रीगणेश जी और मां गौरी से प्रार्थना की थी। पिनाक धनुष टूटने के बाद परशुराम जी का ध्यान भंग हुआ और वे क्रोध में मिथिला पहुंचे प्रभु श्रीराम जी से उनका मिलन हुआ और वह शांत हुए।

प्रभु श्रीराम जी और जनक नंदिनी माता सीता जी का विवाह सम्पन्न हुआ साथ ही चारों भाइयों का भी विवाह हुआ। मिथिला और अयोध्या में हर्ष और उल्लास का माहौल हुआ सभी लोग आनंदित हुए। कुछ समय मिथिला में रहने के बाद प्रभु श्री राम जी और माता सीता जी अयोध्या आए अयोध्या में भी सभी माताओं ने श्रीराम और माता सीता जी की ह्रदय से स्वागत किया और अनेकों उपहार देकर सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया। सभी अयोध्यावासी अति आनंद और हर्ष उल्लास के साथ अपना जीवन जीने लगे।
जय श्री सीताराम।
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