देवी तथा आसुरी स्वभाव
जय श्रीकृष्ण
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के १६ वे अध्याय में अपने प्रिय सखा अर्जुन को कहते है कि इस प्रकृति में जीवात्मा के दो स्वभाव होते है। १.देवी स्वभाव २. आसुरी स्वभाव यही दोनों स्वभाव जीव को ऊंचा उठता है और नीचे गिरता है। देवताओं जैसा जो आचरण करता है वह दैवीय स्वभाव कहलाता है। जिसमें की दया धर्म करुणा सत्यता और भगवान के प्रति प्रेम का भाव होता है। दैवीय स्वभाव वाला व्यक्ति धर्मानुकूल आचरण करता है धार्मिक ग्रंथों का पठन पाठन के साथ साथ दूसरों को भी सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करता है यही दैवीय गुण है।
आसुरी गुण वाला जीवात्मा- क्रोध लोभ और मोह में उलझा रहता है वह भगवान को नहीं मानता है असुरों जैसा आचरण करता है। दूसरों को कष्ट देने में उसे आनंद आता है इस तरह का जीवात्मा नरक योनी में यानी नीच योनि में जन्म लेता है और अनेकों कष्ट भोगता है। इसीलिए जीव को अपने स्वभाव के प्रति जागरूक रहना चाहिए कि मेरे अंदर कौन सा स्वभाव विकसित हो रहा है उसे अपने आपको ही आंकलन करना चाहिए। तभी वह जीव जान सकता है कि हम किस तरफ जा रहे है और हमें किस ओर जाना चाहिए।
जो जीवात्मा भगवान के प्रति आस्था और विश्वास का भाव रखता है और धर्मानुकूल आचरण करता है वह दैवीय गुण है। वही जीवात्मा भगवान का प्रिय होता है और भगवान उसे कल्याण का मार्ग दिखाते है जिसे उस जीव का उद्धार हो सके।
वही आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य भगवान को नहीं मानते भौतिक संसाधनों में ही अपने संसार को देखता है। वह मनुष्य लोभी क्रोधी और दुराचारी स्वभाव वाला होता है जो नीच योनि में जन्म लेता और मरता रहता है। इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर देवी गुण को विकसित करे और भगवान का प्रिय बने जिससे उसका अनेकों जन्मों का पाप मिट जाए और वह परमधाम भगवान के चरणों में पहुंच जाय।
राम राम के करने सब यश दिन्हों खोई
मूर्ख जाने घटी गयो पर दिन दिन दूना होई।
जय श्रीकृष्ण
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