पुरुषोत्तमयोग
जय श्रीकृष्ण :- भगवान श्रीकृष्ण ने सखा अर्जुन को कहते है कि यह संसार बरगद के पेड़ जैसा है जिसका जड़ ऊपर की तरफ होता है जो कि परम ब्रह्मा को पाना चाहता है उनसे ही अपना ऊर्जा ग्रहण करता है । लेकिन उस बरगद की टहनियों नीचे की तरफ झुकता है जो कि संसार के माया को आकर्षित करता है। यह संसार त्रिगुणीय माया के बस में है । सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण ये तीनों गुण संसार में जीवात्मा को माया में बांधता है अपनी माया में उलझाता है। जो जीवात्मा इस त्रिगुणिये माया से ऊपर या परे हो जाता है वह जीव परमात्मा को पा लेता है । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के १५ वे अध्याय में सखा अर्जुन को समझाते हुए कहते कि मनुष्य को मेरे शरणागत होकर अपना निष्कामभाव से कर्म करना चाहिए और अपने मन बुद्धि को भगवान के चिंतन से सींचना चाहिए इससे मनुष्य का कल्याण होगा।
पुरुषोत्तम
भगवान तो पुरुषोत्तम के भी पुरुषोत्तम है। उनकी लीला उनका ज्ञान एवं उपदेश का जो भी जीवात्मा मनन करता है या भगवान द्वारा बताए गए रास्ते पर चलता है भगवान की माया उसे नहीं बांधता है। इसीलिए भगवान समय समय पर अवतरित होकर जीव के कल्याण का रास्ता बताते है। क्योंकि जीवात्मा का जो आत्मा है वह परमात्मा का ही अंश है । इस परमात्मा का अंश को सही ज्ञान और उपदेश देकर उसे जन्म और मरण से मुक्ति प्रदान करते है। जो जीव भगवान की आराधना उनकी भक्ति प्रेम एवं निर्मल भाव के करता है उनको भगवान अपने शरण में स्थान प्रदान करते है। उस जीवात्मा का अनेकों जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है। उसे फिर संसार की माया कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। जो भगवान का हो गया उसे फिर किस बात की चिंता? इसीलिए अपना मन और बुद्धि को भगवान के चरणों में लगाना चाहिए तभी सभी चिंता से मुक्ति मिलेगी।
हमारे साथ श्री रघुनाथ तो किस बात की चिंता।
किया करते हो तुम दिन रात क्यों बिन बात की चिंता।
जय श्रीकृष्ण
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