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शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १४

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १४
प्रकृति के तीन गुण
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के १४ वे अध्याय में परम सखा अर्जुन को कहते है कि यह प्रकृति तीन गुणों के आधार पर संचालित होता है। ये तीनों गुण जीवात्मा को प्रभावित करता है और अपने जाल में फंसता रहता है। ये तीनों गुण भगवान के माया का ही प्रभाव है। जीवात्मा अगर इस तीनों गुण को पहचान जाए और उसी के अनुसार अपना जीवन जिए तो अच्छा क्या है और बुरा क्या है समझ जाएगा। क्योंकि यही तीनों गुण जीवात्मा को मोक्ष भी देता है और अधोगति भी देता है। इसे पहचानना अति अवयस्क होता है। ये तीनों गुण है १.सतोगुण २.रजोगुण ३.तमोगुण यही तीनों गुण इस प्रकृति में अपना व्यवहार करता है और इसी से जीवात्मा जकड़ा रहता या इसमें उलझा रहता है। यही तीनों गुण जीवात्मा के मन बुद्धि और शरीर को प्रभावित करता रहता है इसे पहचानना कठिन तो होता है पर संभव भी होता है।

१. सतोगुण- यह गुण जिस जीवात्मा का प्रखर होता उसका स्वभाव शांतचित्त एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाला होता है। दया धर्म शुद्ध आचरण उसका मन बुद्धि और विवेक निर्मल पवित्र सदाचारी होता है। वह भगवान का प्रिय होता है। और मोक्ष को प्राप्त करता है।

२. रजोगुण- यह गुण वाला व्यक्ति संसार के लोभ मोह और आसक्ति में लीन रहता कर्मयोगी तो होता है पर संसार की वृत्ति से जकड़ा रहता है। संसार की माया में उलझकर असंतोष असुरक्षा और आसक्ति में बंधा रहता है। इस जीवात्मा का पुनर्जन्म फिर संसार के इसी माया  रूपी संसार में दुबारा जन्म होता है।

३. तमोगुण- यह गुण जिस जीवात्मा का प्रखर होता है वह लोभी, कामी मांसाहारी और निर्दय दूसरों को कष्ट प्रदान करने वाला और जुआरी होता है। ऐसे जीवात्मा के हृदय में दया करुणा का भाव नहीं होता यह जीवात्मा अधोगति को प्राप्त करता है और अगला जन्म कीरे मकोड़े में जन्म लेता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह बताते है कि जीव को अपना सबकुछ भगवान के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए तभी उसका जीवन सफल हो पाएगा अन्यथा माया के चक्कर में फंसा ही रह जाएगा। जबतक आत्मा का मिलन परमात्मा से नहीं होगा तब तक जीवात्मा को मुक्ति नहीं मिल सकता है। 
जय श्रीकृष्ण

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