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शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १३

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १३
प्रकृति पुरुष चेतना योग
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के अध्याय १३ में यह बताते है कि यह सृष्टि तीन गुणों के आधार पर चलता है सतोगुण -रजोगुण और तमोगुण ये तीनों गुण जीव के कर्मानुसार बढ़ता है औ घटता है। इसी तरह मानव जीवन भी प्रकृति पुरुष और चेतना के आधार पर चलता है। जर चेतन और आत्मा का मिश्रण से ही हमारा जीवन का निर्माण और विकास होता है। मानव शरीर पंचतत्वों से बनता है धरती- जल-अग्नि वायु और आकाश ये सभी प्रकृति के अंश है। चेतना आत्मा का रूप है और मनुष्य देह जर है प्रकृति इस शरीर का पोषक तत्व है। प्रकृति में दैवीय शक्ति भी मौजूद है और आसुरी शक्ति भी मौजूद है हमारा शरीर इसी द्वंद्व में उलझा रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि भगवान का ही है ऐसा हमे मानना चाहिए। हम सत चित और आनंद का ही स्वरूप है यानी सच्चिदानंद का ही अंश है। अगर हमें ऐसा ज्ञान हो जाए तो हम इस प्रकृति से सतगुनी ऊर्जा ग्रहण करेंगे हमारा मन बुद्धि एवं कर्म पवित्र और सत्यनिष्ठ होगा। तब हमारा चेतना यानी आत्मा को भगवान में प्रीति होगी और हमारा जीवन सफल होगा।

प्रकृति का प्रभाव,

हमारे जीवन में प्रकृति का बहुत बड़ा प्रभाव होता है हमारे सभी कर्म को प्रभावित करता है हमे प्राकृति से क्या लेना है यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। हम जैसा ग्रहण करेंगे हम वैसा बनेंगे और हमारा मन बुद्धि उसी के अनुसार इंद्रियों को प्रभावित करेगा। तब हम वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा हमने प्रकृति से सीखा है। भगवान श्रीकृष्ण कहते है जीव अपना सबकुछ कर्म अकर्म हमे सौंप दे और निष्काम भाव से कर्म और भक्ति करें तब उस जीव को भगवान इस प्रकृति के माया से मुक्त करके उसे पवित्र और निर्मल बना देंगे। और यही दो पवित्रता और निर्मलता भगवान को प्राप्त करने में सुगमता प्रदान करता है। क्योंकि भगवान को ये प्रकृति या माया जरा भी प्रभावित नहीं करता भगवान जीव के कल्याण के लिए इस प्रकृति और माया का उपयोग करते है। मनुष्य इस प्रकृति और माया से भगवान के शरणागत होकर ही बच सकता है। इसीलिए अपना समस्त कर्म और धर्म भगवान को समर्पित कर देना चाहिए। तब हमारा जीवन सुधार जाएगा और भगवान हमे स्वीकार कर लेंगे यही जीवन का मुख्य उद्देश होना चाहिए।
जय श्रीकृष्ण

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