भक्तियोग
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के १२ वे अध्याय में परम प्रिय सखा अर्जुन को भक्तियोग का ज्ञान प्रदान करते है। भगवान कहते है भक्ति चार प्रकार से की जाती है ज्ञान के द्वारा ध्यान के द्वारा कर्म के द्वारा और भक्ति के द्वारा लेकिन इसमें सबसे प्रखर भक्ति भक्तियोग के द्वारा होता है। भगवद्गीता के पिछले अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बहुत प्रकार के उपदेश और ज्ञान प्रदान किए है और अपना विराट स्वरूप का भी दर्शन कराया है। इसके बाद अर्जुन के मन में भगवान के प्रति स्नेह करुणा सच्चा प्रेम और भक्ति का भाव जागृत हुआ है। भगवान ने भक्तियोग का ज्ञान समझाते हुए सखा अर्जुन को कहते है कि जब जीव निर्मल मन के साथ श्रद्धा और विश्वास के साथ मेरा भक्ति करता है तो मै उसे सहस्र स्वीकार कर लेता हूँ। भक्ति में प्रेम करुणा विश्वास श्रद्धा होना अति अवयस्क होता है।
कर्म फल का त्याग और प्रत्येक कर्म भगवान को समर्पित करके किया जाए यही सच्चा भक्ति है। भक्ति भगवान का निराकार रूप और साकार रूप दोनों में होता है परंतु साकार रूप में भक्ति में मन चित और श्रद्धा भाव शीघ्र जागृत होता है। इसीलिए साकार रूप का ही भक्ति श्रेष्ठ कहलाता है इसमें सफलता शीघ्र मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने भक्तियोग के बारे बताते हुए अर्जुन को कहते है कि पूर्ण समर्पण पूर्ण श्रद्धाभाव के साथ भगवान का भक्ति करना ही सच्चा भक्ति कहलाता है। केबल ज्ञान से या ध्यान से या कर्म से भक्ति प्रखर नहीं होता है भक्ति का भाव जागृत होना जरूरी है जब भक्त के मन में भगवान के प्रति भक्ति का भाव जागृत हो वही भक्ति कहलाता है।
पढ़ने ही हद समझ है समझ की हद है ज्ञान
ज्ञान का हद हरिनाम है यह सिद्धांत सब जान।
सभी ज्ञान का अंतिम परिणाम हरिनाम होना चाहिए यही सच्चा भक्ति होता है
जय श्रीकृष्ण
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