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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय ८

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय
भगवद्प्राप्ति & ब्रह्मज्ञान 
मानव का मुख्य उद्देश्य भगवद्प्राप्ति ही है। परंतु भगवान के माया ने मानव को बस में कर रखा है। इस माया से मुक्त होने का केबल एक ही रास्ता है भगवान की भक्ति निष्कामभाव के किया जाय उनको अपना सम्पूर्ण अथवा सर्वस्व उनके चरणों में समर्पित कर दे तब आप देखिए माया आपको कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि इस माया का सत्ता भी तो सत्ताधारी भगवान ही है। उन्हीं के अनुसार यह माया अपना काम करता है। वैसे तो माया का खेल भगवान स्वयं भी खेलते है हम तो मनुष्य है। 

इस ब्रह्माण्ड के मालिक भगवान ने मनुष्य को अपना सबसे प्रिय जीव माना है क्योंकि आत्मा और परमात्मा का मिलन इस मानव शारीर के द्वारा ही सुलभ होता है अन्य जीवों के अपेक्षा, इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि इस धरा पर भगवान ने हमे मनुष्य रूप में आने का अवसर दिया है तो हम इसे भगवान का सबसे बड़ा उपहार माने उनको कोटि कोटि धन्यवाद दे। और कहे हे प्रभु मुझे अपने शरण में रखना आपको मै कभी भूलूं नहीं ये भावना के साथ अगर हम अपना जीवन जिएंगे तो हमारा जीवन सफल और धर्मानुकूल बना रहेगा भगवान के चरणों में प्रीति बनी रहेगी और हमारा कल्याण ही कल्याण होगा।

भगवद्प्राप्ति और ब्रह्मज्ञान मानव शारीर के लिए अत्यंत अवयस्क है क्योंकि इन्हीं दोनों की वजह से हम भगवान को जान सकते है। वैसे तो आत्मा शाश्वत है और शरीर नश्वर है फिर भी आत्मा अपना एक स्वरूप में आता है और वही रूप में आत्मा अपना पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। इसीलिए इस अनमोल मानव शारीर को भगवद्भक्ति में लगाना चाहिए और इस संसार में निष्कामभाव से कर्म करते हुए अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में समर्पित कर दे। यही ब्रह्मज्ञान और भगवद्प्राप्ति है।
मनुष्य अपने अंतिम समय में यानी कि मृत्यु के समय भगवान का असमरण यानी कि उनको याद करे तो भगवान उसे अपने परमधाम की प्राप्ति कराते है। और ये तभी संभव है जब हम अपने शरीर के द्वारा आत्मा में परमात्मा को साक्षी मानकर भगवान की भक्ति करेंगे तभी हमे अंतिम समय में भगवान का असमरण होगा और तभी हमे मोक्ष की प्राप्ति होगी। यही मानव देह का सबसे बड़ा उपलब्धि है ।
जय श्रीकृष्ण।

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