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रविवार, 26 जुलाई 2026

विनय पत्रिका

श्री तुलसीदास रचित– विनय पत्रिका
नित्य प्रार्थना 
कर प्रणाम तेरे चरणोंमे लगता हूँ अब तेरे काज।
पालन करने को आज्ञा तब मैं नियुक्त होता हूँ आज।।
अंतर में स्थित रहकर मेरे बागडोर पकड़े रहना।
निपट निरंकुश चंचल मन को संधान करते रहना।।
अंतर्यामी को अंतः स्थित देख सशंकित होवे मन।
पाप वासना उठते ही हो नाश लाज से वह जल भून।।
जीवों का कलरव जो दिनभर सुनने में मेरे आवे।
तेरा ही गुण ज्ञान जान मन प्रमुदित हो अति सुख पावे।।
तू ही है सर्वत्र व्याप्त हरि तुझमें यह सारा संसार।
इसी भावना से अंतरभर मिलूँ सभी से तुझे निहार।।
प्रतिपल निज इंद्रिय समूह से कुछ भी आचार करूँ।
केवल तुझे रिझाने को बस तेरा ही व्यवहार करुँ।।

श्रीगणेश–स्तुति
गाईये गणपति जग बंदन। शंकर सुमन भवानी नंदन।।
सिद्धि सदन गज बदन विनायक। कृपा सिंधु सुंदर सब लायक।।
मोदक प्रिय मुद मंगल दाता। विद्या बारिधि बुद्धि बिधाता।।
मंगत तुलसीदास कर जोर। बसहिं रामसिय मानस मोरे।।

भावार्थ–
संपूर्ण जगत के वंदनीय गणों के स्वामी श्रीगणेश जी का गुणगानके कीजिये, जो शिव पार्वती के पुत्र औ उनको प्रसन्न करने वाले हैं। जो सिद्धियों के स्थान हैं, जिनका हाथी का सा मुख है, जो समस्त विघ्नों के नायक है कृपा के समुद्र है, सुंदर है सब प्रकार से योग्य हैं। जिन्हें लड्डू बहुत प्रिय है, जो आनंद और कल्याण को देनेवाले हैं, विद्या के अथाह सागर है बुद्धि के विधाता है। ऐसे श्रीगणेशजी से यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर मांगता है कि मेरे मन मंदिर में श्री सीतारामजी सदा निवास करें।

सूर्य–स्तुति
दीनदयाल दिवाकर देवा। कर मुनि मनुज सुरासुर सेवा।।
हिम तम करि केहरि करमाली। दहन दोष दुख दूरित रूजाली।।
कोक कोकनद लोक प्रकाशी। तेजप्रताप रूप रस राशी।।
सारथी पंगु दिव्य रथ गामी। हरिशंकर बिधि मूरति स्वामी।।
वेद पुराण प्रगट जस जागै। तुलसी राम भगति वर मांगै।।

भावार्थ–
हे दीनदयाल भगवान सूर्य। मुनि मनुष्य देवता और राक्षस सभी आपकी सेवा करते है। आप पाले और अंधकार रूपी हाथियों को मारनेवाले वनराज सिंह हैं। आप किरणों की माला पहने रहते हैं, दोष दुख: दुराचार और रोगों को भस्म कर डालते हैं। रात के बिछुड़े हुए चकवा चाकवियों को मिलाकर प्रसन्न करने वाले कमल को खिलाने वाले तथा समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाले हैं। तेज, प्रताप, रूप और रस की आप खान हैं। आप दिव्य रथ पर चलते हैं,  आप विष्णु शिव एवं ब्रह्मा का ही रूप है। वेद पुराणों में आपकी कीर्ति जगमगा रही है। तुलसीदास आपसे श्रीराम भक्ति का वर मांगता है।

जय श्रीसीताराम

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