राज विद्यायोग,परम गुहा ज्ञान
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम शखा अर्जुन को समझाते हुए कहते है। हे प्रिय अर्जुन मै अजन्मा अविनाशी हूं मै आवयश्कता अनुसार विभिन्न रूप को धारण कर इस पृथ्वी पर अवतरित होता रहता हूं। मुझे तुम साधारण मनुष्य मत समझो मै ही आदि हूँ और मै ही अनंत हूँ। ये पूरा सृष्टि हमसे ही उत्पन होता है और समय आने पर मुझमें ही समा जाता है। यही सत्य और शाश्वत है। जो मनुष्य मुझे जान लेता है और मुझपर विश्वास करता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वह जन्म और मरण से मुक्त हो जाता है। परंतु मेरा भक्ति करना और समर्पण भाव से मुझमें अपना मन लगाना सबके बस की बात नहीं होता है। मेरा माया उसको भटकने की पूरा कोशिश करता है। परंतु जो भक्त मेरा भक्ति में अडिग रहता है निष्कामभाव से कर्म करता हुआ मुझमें ही समर्पण करता है वह मनुष्य इस भव से पार उतर जाता है और मुझको ही प्राप्त करता है। हे अर्जुन मुझे केबल यह मानव शारीर वाला मनुष्य मत समझ मै ही जगत का निर्माता पालनकर्ता और समय आने पर मुझमें में ही यह सृष्टि विलीन हो जाता है। ऐसा ही तुम मुझे जानों इसी में समझदारी है और यही सत्य है।
मै ही ॐ हूँ। मै ही चारों वेद हूँ। मै ही सर्वोत्तम हूँ। मै ही सूर्य और चंद्रमा को प्रकाश प्रदान करता हूँ। मै ही पृथ्वी का भार धारण करता हूँ। मै ही वायु का तेज हूँ। ये पूरा सृष्टि हमसे ही संचालित होता है और हम में ही विलीन हो जाता है। ऐसा ज्ञान ऐसा बुद्धि जिस मनुष्य के पास है वह मुझे जान सकता है। इसीलिए हे अर्जुन तुम निष्कामभाव से कर्म करते हुए सब कुछ मुझ पर छोड़ दो आगे मै संभालुंगा। जो मनुष्य धर्मानुकूल अपना जीवन का परिपालन करता है और भगवान को अपना हितैषी मानता है उसका मन निर्मल और शांत होता है वही मनुष्य मुझ तक पहुंच सकता है।
मोहे छल कपट छिद्र नहीं भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
जिसका मन निर्मल होता है जिसके मन में छल कपट नहीं होता मोह और लोभ नहीं होता वही मनुष्य मुझको पाता है। और उसका मै सदा ध्यान रखता हूँ। अनेक जन्मों का दुख और क्लेश को मै समाप्त कर देता हूँ और अपना शरण में स्थान देता हूँ । यही मनुष्य जीवन का उद्देश है।
जय श्रीकृष्ण।
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