"भगवद्ज्ञान "
ज्ञान और विज्ञान
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान की महिमा एवं उनके प्रभाव का वर्णन करते हुए शखा श्री अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि यह जगत और जीवन दोनों मेरे ही संचालन से संचालित होता है। ज्ञान और विज्ञान ये दोनों मेरे ही द्वारा क्रिया करता है इसके मूल आधार मै ही हूँ। मेरा ही दो शक्ति परा और अपरा इन्हीं से जगत और जीवन चलता है। जो मनुष्य इसे अपने सद्ज्ञान से जान लेता है वह मेरा प्रखर माया से विचलित नहीं होता वह मनुष्य अपने जीवन को सही मायने में कुशल पूर्वक जीता है।
यह संसार तीन गुणों के आधार पर चलता है सतोगुण,रजोगुण और तमोगुण ये तीनों गुण भगवान के द्वारा ही संचालित होता है। यह सृष्टि में तीनों गुण विद्यमान है हमारा धर्म क्या है हमे कैसे जीना चाहिए ये सभी बाते अनादिकाल से हमारे धर्म शास्त्रों में विदित है जो मनुष्य इसके अनुसार कर्म करता है या सोचता है वही जीव मुझको प्रिय है। भगवान के अलावा कुछ भी इस संसार में शाश्वत नहीं है सभी नश्वर है। जो जीव मुझमें अपना मन लगता मेरा भक्ति सच्चे मन करता उसके लिए मै सदैव विद्यमान रहता हुं। वह मुझे जिस रूप याद करता है मै उसी रूप में उस जीव को मिलता हूं। इस सृष्टि का समस्त ज्ञान और विज्ञान मेरे द्वारा ही संचालित होता है। अग्नि,जल,वायु, पृथिवी और आकाश ये सब भगवान का ही रचना है। अर्थात मेरे द्वारा ही इनका भी संचालन होता है। मै सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ, वायु का वेग हूँ, पृथिवी का। सुगंध हूँ, जल का स्वाद हूँ मन और बुद्धि भी मै ही हूँ। जो मनुष्य इन सब बातों को ध्यान में रखता है और उसी अनुसार धर्माचरण के सात अपना निष्कामभाव से कर्म करता है वही जीव मुझको प्राप्त करता है।
इसीलिए मुझमें ही अपना मन को एकाग्र करो धर्म अनुकूल कर्म करो मेरा भक्ति करो तो तेरा कल्याण निश्चित है। जो मनुष्य समर्पण भाव से मुझको भजता है निष्कामभाव से कर्म करता है वही मनुष्य मुझको प्रिय है और मुझको प्राप्त करता है। प्रत्येक आत्मा में परमात्मा का ही अंश विद्यमान है जो इसे जान लेता है समझ लेता है वह मेरा प्रखर माया से बचा रहता है उस जीव को मै खुद ध्यान रखता हूं।
अगर नाथ का नाम दयानिधि है तो दया भी करेंगे कभी ना कभी।
यही सत्य है और शाश्वत है।
जय श्रीराधे कृष्णा।
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