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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय ६

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय ६

ध्यानयोग 
भगवान की प्राप्ति ही सही मायने में मानव जीवन का प्रथम लक्ष्य है। जो कि ध्यानयोग के बिना संभव नहीं है। माया का इतना बड़ा प्रभाव है कि हमारा मन एकाग्र नहीं रह पाता है मन बहुत ही चंचल होता है इसे एकाग्र करना यानी संतुलित करना बड़ा की कठिन होता है। और यह केवल ध्यानयोग के द्वारा ही संतुलित हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहते है कि तुम अपने आपको मुझे समर्पित कर दो यही समर्पण तुम्हे कल्याण करेगा और सभी दुविधाओं को दूर करेगा।










मनुष्य जीवन अनमोल है भगवान का अद्भुत संरचना है जिसने मुझे इस धारा पर भेजा है उसका कोई न कोई उद्देश्य है और उसे जानना और समझना प्रत्येक मानव का धर्म है। बिना इसे जानना हमारा जीवन अधूरा है। भगवान के अनमोल रत्नों में से मानव यानी मनुष्य जीवन सबसे बड़ा अनमोल रत्न है और इस अनमोल रत्नों को मनुष्य कौड़ी के जैसा समझकर व्यवहार करता है। मनुष्य जीवन में हमे भगवान से जुड़ने का उनका अनुग्र पाने का उनको कोटि कोटि धन्यवाद देने का अवसर मिलता है जो कि मनुष्य जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है। 
ये सब तभी संभव है जब हम मन को शांत करके ध्यानयोग से एकाग्र होकर अपने मूल स्वरूप को जानने का प्रयास करेंगे तो हम समस्त विकारों से एवं अनेक अनिश्चिताओं से मुक्त हो सकते है। अपने मन को निर्मल बनाए आत्मा को भगवान के साथ जोड़े धर्मानुसार निष्काम भाव से कर्म करे तो हमारा उन्नति होगा और ईहलोक और परलोक दोनों सुधर जाएगा। सत्यनिष्ठ बने धर्म अनुकूल चले भगवान को हर परिस्थित में धन्यवाद दे तब जीवन धन्य हो जाएगा। यही मनुष्य जीवन का प्रथम उद्देश्य है और यही भगवान को प्रिय है।

अगर हम सभी कार्य भगवान को समर्पित कर करेंगे तो हमारा मन शुद्ध और सात्विक होगा सतोगुण का विकाश होगा मन निर्मल बनेगा सुख-दुख लाभ-हानि से हमारा मन विचलित नहीं होगा। तभी हम आनंद का अनुभूति कर पाएंगे। यही सच में जीवन का सार्थकता है। और यही भगवान को प्रिय है।

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