कर्म और संन्यास
कर्म और संन्यास को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहते है की निष्काम भाव से जो मनुष्य कर्म करता है और अपने कर्म को मुझे समर्पित करता है वही सच्चा कर्म है और वही संन्यास के श्रेणी में आता है। कर्म और संन्यास का मंजिल एक ही है वह है सभी कर्म भगवानको को समर्पित करना जो मनुष्य ऐसा करता है या ऐसी समझ रखकर कर्म करता है वह मुझे प्रिय है। सही मायने में वही कर्म करते हुए भी संन्यास को प्राप्त करता है। जिस मनुष्य का मन निर्मल होता है उसके द्वारा किया गया कर्म उत्तम होता है पवित्र होता वही कर्म सच्चा कर्म कहलाता है और ऐसे ही भावना युक्त मनुष्य संन्यास को प्राप्त करता है और मुझको पा लेता।
जो कर्म शास्त्र अनुकूल हो धर्म अनुकूल को पवित्र हो शुद्ध हो वही कर्म संन्यास कहलाता है। जो मुझे भी प्रिय लगता है। जिस कर्म में आसक्ति न हो, भक्ति हो समर्पण हो प्रेम हो ऐसा ही कर्म उत्तम कर्म कहलाता है और जो व्यक्ति ऐसा करता है वही मनुष्य मुझको प्राप्त करता है वही संन्यास है। इस धरा पर जितने ही जीव जंतु है चर अचर है वह मेरा ही अंश है जो मनुष्य इन सभी को भगवान का अंश मानता है और उसी के अनुसार उससे व्यवहार करता है वही योग्य एवं ज्ञानी मनुष्य है। उसका समर्पण भाव से किया गया कर्म ही संन्यास कहलाता है। वह मनुष्य सभी बंधनों से मुक्त होता है और मुझको प्राप्त करता है। और मै उसे सहस्र स्वीकार करता हूं।
निष्कामभाव से कर्म करना ही संन्यास है।
मनुष्य जीवन अनमोल है भगवान के सबसे प्रिय है जो मनुष्य मुझको भजता है मै उसका सदैव ख्याल रखता हूं। हर परिस्थित में मै उसका ध्यान रखता हूं। वह मनुष्य मुझे प्रिय है। धर्म और शास्त्र के अनुसार जो मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करता है वही सर्वोत्तम कर्म है और वही संन्यास योग कहलाता है। वह मनुष्य कर्म करते हुए भी कर्म से मुक्त रहता है। वह मनुष्य मुझको प्रिय है और उसी का जीवन सफल कहलाता है।
कर्म करते रहो नाम जपते रहो तेरा जीवन सफल हो जाएगा। मन वचन और कर्म से जो मुझको भजता है मै उसको भजता हुं।
कर्म करो फल की इच्छा मत रखो, कर्म करना तुम्हारा अधिकार है और फल देना मेरा अधिकार इन बातों को जो मनुष्य समझ लेता है वह मुक्त रहता है। उसका मै सदैव ध्यान रखता हूं।
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