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रविवार, 18 जनवरी 2026

श्रीमद् भवीगवद्गीता अध्याय ४

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय ४

ज्ञान कर्म और संन्यास 

भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद 
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को  ज्ञान और कर्म का परिचय कराते है। सबसे पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना व्यक्तित्व एवं उद्देश्य से परिचय कराते है। हम कौन और तुम कौन ? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा मै अजन्मा अविनाशी हूं। मैं योग माया से इस धरती पर आवयश्कता अनुसार अवतरित होता हूं। जब भी इस धरती पर धर्म का नाश होता है और अधर्म बढ़ता है तब-तब मै अपनी योगमाया से अवतरित होता हूं। क्योंकि ये पूरा ब्रह्माण्ड मेरा है इसका संचालन सही रूप में होता रहे, धर्मपरायण मनुष्यों की रक्षा करना हमारा दायित्व होता है। इसीलिए हमे समय-समय पर अवतार लेना पड़ता है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा तुम हमारे शखा हो  और तुम योग्य भी हो इसीलिए तुम्हे हम उस गूढ़ ज्ञान का उपदेश देता हूं जो सबसे पहले हमने सूर्य देव को दिया था और सूर्य देव ने वैवस्वत मनु को दिया और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को दिया। वहीं ज्ञान आज तुम्हे प्रदान करता हूं। ध्यान से सुनो अर्जुन। मैं अजन्मा अविनाशी हूं मै अपनी योग माया से समय-समय पर आवयश्कता अनुसार अवतरित होता रहता हूँ। तुम्हारा अनेकों जन्म हो चुका वह तुम नहीं जानते वह मैं जनता हूँ। दिव्यज्ञान के बिना इसे जानना असंभव है। और दिव्य ज्ञान मेरे द्वारा ही संभव है। जो मनुष्य मेरा भक्ति करता है अपने आप को मुझे समर्पित करता है उसका ध्यान हम खुद रखते हैं। जो मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करता है फल की इच्छा किए बिना ! कर्म का फल मुझ पर छोड़ देता है वह ज्ञानी मनुष्य हमे प्रिय है। सही में वही कर्म है। आसक्ति के बिना कर्म करना ही कर्म कहलाता है जो ज्ञानी मनुष्य ऐसा करता है उसका ध्यान हम खुद रखते है।

मोहि छल कपट छिद्र नही भावा॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

हे अर्जुन तुम अपना कर्म मुझे सौंप कर करो, आसक्ति के बिना वही सच्चा कर्म कहलाएगा। मन को निर्मल बनाओ जिसका मन निर्मल होता है बिना छल कपट के वह मनुष्य हमे प्रिय है। उसका ध्यान हम खुद रखते है क्योंकि वह अपना सब कुछ मुझ पर छोड़ देता है  इसीलिए मैं भी उस मनुष्य को नहीं छोड़ता हूँ। तुम कर्म करो फल की इच्छा मत करो तुम केवल कर्म के अधिकारी हो फल का नहीं फल मुझ पर छोड़ दो केबल निष्काम भाव से कर्म करो यही तुम्हारा कर्तव्य है। लोभ मोह आशक्ति को त्याग कर केवल कर्म करो। इस धरती पर जो आया है वह एक दिन जाएगा ही यही सत्य है।जन्म का कारण भी मै ही हूँ और मृत्यु का कारण भी मै ही हूँ इसीलिए तुम चिंता छोड़कर केवल निष्काम भाव से कर्म करो। इसमें ही तेरा भला है। जो चीजें आज तेरा दिख रहा है वह कल किसी और का था और कल किसी और का होगा यही सत्य है इसलिए मोह का त्याग करके केबल कर्म करो और फल मुझ पर सौंप दो मै सब कुछ देखता हूँ। मरे अनन्य नेत्र है। मुझसे कुछ भी ओझल नहीं होता है मै सब जनता हूँ। लोभ मोह मद का त्याग कर निष्काम भाव से कर्म करना ही ज्ञानी मनुष्य का धर्म है। तभी वह मनुष्य मुझको प्राप्त कर सकता है। और तभी उसका जीवन सफल कहलाएगा।

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