दीनदयालु भगत आरति हर, सब प्रकार समरथ भगवान।।
कालकूट जूर जरत सुरासुर, निज पन लागि किए विष पान।
दारुण दनुज जगत दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही बान।।
जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत श्रुति सकल पुरान।
सो गति मरन काल अपने पुर, देत सदाशिव सबहिं समान।।
सेवत सुलभ उदार कलपतरु, पार्वती पति परम सुजान।
देहु काम रिपु राम चरण रति, तुलसीदास कहँ कृपानिधान।।
भावार्थ—:
भगवान शिवजी को छोड़कर और किससे याचना की जाय? आप दिनों पर दया करनेवाले भक्तोंके कष्ट हरनेवाले और सब प्रकार से समर्थ ईश्वर हैं।
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष की ज्वाला से सब देवता और राक्षस जल उठे, तब अपने दिनों पर दया करके प्राणों की रक्षा के लिए तुरंत उस विष को पी गए। जब दारुण दानव त्रिपासुर जगत को बहुत दुख: देने लगा तब आपने उसको एक ही बाण से मार डाला।
जिस परमगति को संत महात्मा वेद और सब पुराण महान मुनियों के लिए भी दुर्लभ बताते है, हे सदाशिव वही परमगति काशी में मरने पर आप सभी को समान भाव से देते है।
हे पार्वती पति हे परम सुजान, सेवा करने पर आप सहज में ही प्राप्त हो जातें है, आप कल्पवृक्ष के समान मुंहमांगा फल देनेवाले उदार है, आप कामदेव के शत्रु हैं। अतएव हे कृपानिधान, तुलसीदास को श्रीराम के चरणों की प्रीति दीजिए।
जय श्री सीताराम।
https://www.jivankisachai.com/
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
please do not enter any spam link in the coment box.