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गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १०

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय १०
विभूतियोग, श्री भगवान का ऐश्वर्य
भगवान श्रीकृष्ण ने परम प्रिय सखा अर्जुन को भगवद्गीता के १० में अध्याय में अपने अनंत विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते है कि मै ही अलौकिक सर्वशक्तिमान अद्वितीय हूँ। मुझसे ही इस सृष्टि का निर्माण होता है और संचालन होता है और अंत में मुझमें ही पूरा सृष्टि समा जाता है। ऐसे ही यह सृष्टि का चक्र युगों युगों तक चलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा मेरा न कोई आदि है और न कोई अंत मै अनंत हूँ।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने विभूतियों का वर्णन करते हुए सखा अर्जुन से कहते है मेंरे विस्तार का कोई अंत नहीं है। मै समस्त चर अचर जीवों का आधार हूँ। मै अलौकिक एवं सर्वोत्तम से सर्वोत्तम हूँ। मै समस्त प्रणियों के जीवन में स्थित हूं, मै ही समस्त जीवों का आदि मध्य और अंत हूँ। मै विष्णु हूँ, प्रकाश में सूर्य और चंद्र हूँ। वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं मै इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों में चेतना हूँ। रुद्रों में मै शंकर हूं, यक्षों में कुबेर हूँ, पर्वतों में मेरु पर्वत हूँ, पुरोहितों में बृहस्पति हूँ, सेना नायकों में कार्तिकेय हूँ, जलाशयों में समुद्र हूँ, महर्षियो में मै भृगु हूँ। ध्वनियों में दिव्य ॐ हूँ, यज्ञों में जप यज्ञ हूँ, अचल पदार्थों में हिमालय हूँ। वृक्षों में बरगद का वृक्ष हूँ, और देव ऋषियों में नारद हूँ। सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ, आशुओं में उच्चेश्रवा हूँ, हाथियों में ऐरावत हूँ, मनुष्यों में राजा हूँ। शस्त्रों में वज्र हूँ, गाय में कामधेनु हूँ, मै प्रेम का देवता कामदेव हूँ, और सर्पों में बासुकी हूँ। मै ही वरुण हूँ मै ही यमराज हूं, पशुओं मै सिंह हूँ, और पक्षियों में गरुड़ हूँ। मै ही वायु हूँ, मै ही अग्नि हूँ। नदियों में मै गंगा हूँ। हे अर्जुन मुझे ही समस्त सृष्टि का आदि मध्य और अंत जानों। सभी विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ। इस सृष्टि में जो भी उत्तम से उत्तम या सर्वोत्तम है वह सब मै ही हूँ। मेरे बिना कुछ भी नहीं है, ऐसा ही तुम जानो हे अर्जुन विजेताओं का विजय संकल्पकर्ता का संकल्प हूँ, और धर्मात्माओं का धर्म भी में ही हूँ। ऋषियों में मै वेदव्यास हूँ। सभी प्राणियों का बीज मंत्र मै ही हूँ। तपस्वियों का तप मै ही हूँ।
जो भी घटित होता है उसके मूल में मै ही हूँ। मेरे शरण में जो भी प्राणी अपना सर्वस्व समर्पित करता है वही प्राणी अपना जीवन आनंद पूर्वक जीता है और जन्म मरण से मुक्त हो जाता है।
जय श्रीकृष्ण।

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